दोनों तरफ़ क़ैद: दो क़ब्ज़ों के ख़िलाफ़ मक़बूल भट का संघर्ष

रेखा के दोनों ओर क़ैद

मक़बूल भट ने कश्मीर को बाँटने वाली रेखा बार-बार पार की, किसी एक पक्ष को चुनने के लिए नहीं, बल्कि दोनों को ठुकराने के लिए। भारत और पाकिस्तान, दोनों ने उन्हें गिरफ़्तार किया, उनसे पूछताछ की और उन पर मुक़दमा चलाया। भारत ने उन्हें फाँसी दी।

यह उन दो देशों के बीच उनके जीवन की कहानी है जिन्होंने उनके वतन को बाँटा, और उस मक़सद की जिसे कोई नहीं तोड़ सका: एक आज़ाद कश्मीर, अपने सभी पड़ोसियों के साथ शांति में।

1947–48

भारत और पाकिस्तान की सेनाएँ कश्मीर को दो हिस्सों में काट देती हैं। मक़बूल भट कुपवाड़ा के त्रेहगाम में दस साल के लड़के हैं, उस ज़िले में जिसकी सीमा नई रेखा बनेगी।

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उनका रुख़

कश्मीर के बीच से युद्धविराम रेखा खींची जाती है। किसी कश्मीरी से नहीं पूछा जाता कि यह कहाँ से गुज़रे, या होनी भी चाहिए या नहीं।

1958

श्रीनगर में बी.ए. की परीक्षाओं के बाद छात्र कार्यकर्ताओं को खोज-खोजकर गिरफ़्तार किया जा रहा है। वे भी निशाने पर हैं और भूमिगत हो जाते हैं।

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उनका रुख़

उन्हें दो रास्ते दिए जाते हैं, भारत या पाकिस्तान। वे तीसरा चुनते हैं: ऐसा कश्मीर जो उसके अपने लोगों का हो।

उनका रुख़

निर्वासन में वे आज़ादी का एक आंदोलन खड़ा करने में मदद करते हैं, जो उनके लोगों को बाँटने वाली रेखा के दोनों ओर संगठित हो।

1958–1966

वे पाकिस्तान चले जाते हैं, पेशावर में बसते हैं, पत्रकार के रूप में काम करते हैं और एम.ए. की पढ़ाई करते हैं। फिर वे आज़ाद कश्मीर के लिए पूरी तरह राजनीति में उतर जाते हैं।

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1966–1968

जून 1966 में लौटते हुए वे पकड़े जाते हैं और उन्हें मौत की सज़ा सुनाई जाती है। 1968 में वे श्रीनगर की जेल से भाग निकलते हैं।

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उनका रुख़

मौत की सज़ा संघर्ष को ख़त्म नहीं करती। वे जेल तोड़कर निकलते हैं और एक बार फिर रेखा पार करते हैं।

उनका रुख़

दूसरी ओर उनका स्वागत नायक की तरह नहीं, बल्कि संदिग्ध की तरह होता है। दूसरा देश भी उनके साथ लगभग वैसा ही बर्ताव करता है जैसा पहले ने किया।

1968–1974

वे 25 दिसंबर 1968 को मुज़फ़्फ़राबाद पहुँचते हैं और मार्च 1969 तक वहाँ के पूछताछ केंद्र में रखे जाते हैं। 1971 के गंगा अपहरण के बाद उन्हें फिर गिरफ़्तार किया जाता है और पाकिस्तान की एक विशेष अदालत में उन पर मुक़दमा चलता है।

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1976–1984

मई 1976 में वे फिर रेखा पार करते हैं और कुछ ही दिनों में गिरफ़्तार हो जाते हैं। 11 फ़रवरी 1984 को उन्हें तिहाड़ जेल में फाँसी दी जाती है और जेल के अंदर ही दफ़ना दिया जाता है। उनके परिवार को सूचना नहीं दी जाती।

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उनका रुख़

वे ख़तरा जानते हुए वापस जाते हैं। तिहाड़ में वे अपनी जान के बदले अपने मक़सद का सौदा करने से इनकार कर देते हैं।

आज

उनके अवशेष आज तक नहीं लौटाए गए। उनकी माँ ने दशकों तक उन्हें घर लाने के लिए संघर्ष किया, और रेखा के दोनों ओर कश्मीरी 11 फ़रवरी मनाते हैं।

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उनका रुख़

दो देशों ने उन्हें क़ैद रखा। कोई भी उस विचार को क़ैद नहीं कर सका जिसके लिए वे जिए।

वे उन्हें रेखा के दोनों ओर क़ैद कर सके। वे उस विचार को कभी क़ैद नहीं कर सके: कश्मीरी ख़ुद अपने मालिक हैं, और सम्मान, बराबरी और सभी पड़ोसियों के साथ शांति के भविष्य के हक़दार हैं।

मक़बूल भट के जीवन का विवरण इस साइट पर जीवनी के अध्यायों से लिया गया है, जिन्हें शम्स रहमान ने मक़बूल भट फ़ाउंडेशन के लिए लिखा।